दुख, निराशा, शोक हमारे जीवन के वैसे ही स्थायी भाव हैं जितना की सुख और खुशी. लेकिन फिर भी ऐसा क्या है कि हम दुख को अंदर दबाकर रखना बेहतर समझते हैं. अगर दुख के बारे में खुलकर बात की जाए तो शायद दुख, इतना दर्द न पहुंचा पाए.from Latest News लाइफ़ News18 हिंदी https://ift.tt/2vbng3C
No comments:
Post a Comment