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Sunday, 4 April 2021

सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन 'अज्ञेय' की चार कविताएं: 'सम्भावनाएं'

सांंप! तुम सभ्य तो हुए नहीं नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया। एक बात पूछूंं- (उत्तर दोगे?) तब कैसे सीखा डंंसना विष कहांं पाया? यह कविता है सच्चिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन (Sachchidananda Hirananda Vatsyayan) ‘अज्ञेय’ की. अज्ञेय स्वंतत्रता संग्राम के उन क्रांतिकारियों में से थे जो कई बार जेल गए, वह जो पत्रकार थे, संपादक थे, आलोचक ...

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